कितना बढ़ गया चाँद कितना घट गया; पता चल पाता ना।
है आज पूर्णिमा या कि अमा की रात; पता चल पाता ना।
जब तक लाइट पूरनमासी हो अमा 'दक्ष' जब जाती है;
आलम यह कैसे कटी निशा कमरे में; पता चल पाता ना?
- कौशल किशोर मौर्य ‘दक्ष’