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‘पता चल पाता ना’/ दक्ष की मुक्तक श्रृंखला

                
                                                         
                            कितना बढ़ गया चाँद कितना घट गया; पता चल पाता ना।
                                                                 
                            
है आज पूर्णिमा या कि अमा की रात; पता चल पाता ना।
जब तक लाइट पूरनमासी हो अमा 'दक्ष' जब जाती है;
आलम यह कैसे कटी निशा कमरे में; पता चल पाता ना?
- कौशल किशोर मौर्य ‘दक्ष’
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3 घंटे पहले

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