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याद आई है

KATIB.31 (MD

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस जहाँ में मेरे नही हो तुम
        
                                                    
                            
क्यों इसी बात पे दुखी हो तुम

ये खसारा है ज़िंदगी का मेरी
के किसी और की ज़िंदगी हो तुम

किस लिए तुम उदास रहती हो
ख़ुश रहो बस मेरी ख़ुशी हो तुम

ख़्वाब था ख़्वाब ही रहा मेरा
गैर का ख़्वाब बन चुकी हो तुम

मेरी तक़दीर में लिखे है ग़म
उसकी तक़दीर में लिखी हो तुम

रास्ते अपने अब अलग है मगर
यादों में अब भी बसी हो तुम
-मोहम्मद उवैस कातिब
एक महीने पहले
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