इस जहाँ में मेरे नही हो तुम
क्यों इसी बात पे दुखी हो तुम
ये खसारा है ज़िंदगी का मेरी
के किसी और की ज़िंदगी हो तुम
किस लिए तुम उदास रहती हो
ख़ुश रहो बस मेरी ख़ुशी हो तुम
ख़्वाब था ख़्वाब ही रहा मेरा
गैर का ख़्वाब बन चुकी हो तुम
मेरी तक़दीर में लिखे है ग़म
उसकी तक़दीर में लिखी हो तुम
रास्ते अपने अब अलग है मगर
यादों में अब भी बसी हो तुम
-मोहम्मद उवैस कातिब
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