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राहे वफा में

KATIB.31 (MD

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम बे कसों का मकाँ भी नहीं
        
                                                    
                            
हमको तो कोई गुमाँ भी नहीं

तुझमे अना की हूँ तो है सनम
मुझमे तो में का निशाँ भी नहीं

राहे वफा में लुटा घर दिया
रहने को अब आशियाँ भी नहीं

कार-ए-फ़ुग़ाँ में है मशगूल हम
हमको तो कार-ए-जहाँ भी नहीं

कैसा ये तारी हुआ है सुकूत
खुद के ही मुँह में जबाँ भी नहीं

बाद ए बला नोशी, कातिब से तुम
कहते हो जी का जियाँ भी नहीं

 
एक महीने पहले
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Manju Sharma

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