हम बे कसों का मकाँ भी नहीं
हमको तो कोई गुमाँ भी नहीं
तुझमे अना की हूँ तो है सनम
मुझमे तो में का निशाँ भी नहीं
राहे वफा में लुटा घर दिया
रहने को अब आशियाँ भी नहीं
कार-ए-फ़ुग़ाँ में है मशगूल हम
हमको तो कार-ए-जहाँ भी नहीं
कैसा ये तारी हुआ है सुकूत
खुद के ही मुँह में जबाँ भी नहीं
बाद ए बला नोशी, कातिब से तुम
कहते हो जी का जियाँ भी नहीं
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