विज्ञापन

मन का कुरूक्षेत्र

Kashish Walia

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मन का कुरुक्षेत्र
        
                                                    
                            

एक दिन मेरा वजूद होगा,
एक दिन मेरी भी पहचान होगी,
आज जिन आँखों में चिंता और आँसू हैं,
कल उन्हीं नेत्रों में मेरे लिए सम्मान होगा।

आज भले ही मैं कमजोर हूँ,
पर कल मैं अपार शक्तिशाली होंगी।
आज भले ही मन में शंकाएँ अनेक हैं,
पर एक दिन सब सार्थक प्रतीत होगा।

आज सवाल है मेरे अस्तित्व पर,
पर एक दिन जग में मेरी कीर्ति होगी।
लगता है मानो हार रही हूँ,
परिश्रम से नहीं, किताबों से नहीं,
बल्कि खुद से,
समय की इन बेड़ियों से,
हर पल उठने वाले प्रश्नों से।
क्या मैं कभी सफल हो पाऊँगी?
क्या मेरी कोई पहचान होगी?
मेरा वजूद और मेरी शान होगी?

आज ये मन अर्जुन बन,
बेकारण शंकाओं से घिरा है,
आज मानो मन मेरा नहीं,
मैं मन के वश में हूँ।
आज ये जीवन बेकार लगता है।

पर वही श्री कृष्ण,
मेरे मन के सारथी बन कहते हैं—
हे अर्जुन, किस हेतु बता तू
इस समय असमंजसता को प्राप्त हुआ है?
स्वर्ग मिलेगा न, कीर्ति बढ़ेगी,
फिर क्यों तू इस रणभूमि से भयभीत हुआ है?
तू अज्ञानता छोड़,
मेरी शरणागत हो जा।
शोक न कर, मेरी भक्ति में खो जा।
शस्त्र हैं खिलौने, युद्धभूमि है खेल का आँगन,
क्षत्रिय तो होते हैं युद्धप्रिय स्वभाव के।
कर्म केवल तेरे अधिकार में,
तू बस अपनी निष्ठा से कर्म किए जा।
15 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Bajrang Lal

19 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

12655 कविताएं

View Profile

SATYENDRA KUMAR

133 कविताएं

View Profile