मैं और मेरे सपने
जिद्दी सी, पागल सी थी मैं,
अपने सपनों को लेकर कुछ दीवानी सी थी मैं।
कुछ पाने का जुनून इस कदर सवार था,
कि खुद से ही अनजान थी मैं।
हार मुझे मंजूर नहीं थी,
रुकना मैंने सीखा नहीं था।
बस मंजिलों पर फतह हासिल करना ही लक्ष्य मेरा था।
चाहे स्कूल का टेस्ट हो या फाइनल एग्जाम,
जान लगाकर मेहनत करना मेरी फितरत में था।
फिर वक्त ने करवट ली,
बचपन के सपनों से दिल टूटा,
खुद पर से भरोसा छूटा।
सपनों की डोर छूटी और छूटे अरमान सारे,
जीवन में जो ठाना था,
उसके विपरीत ही निकले परिणाम सारे।
कैसी प्रभु की माया है,
कैसा यह जीवन का अंधकार,
जिसके समक्ष लगे
सारा जीवन ही बेकार।
जीवन का यह रुख भी अनोखा था,
तूफान का एक झोंका था,
जिसने अपने और पराए की लकीर भी बतलाई।
अब फिर से खुद को समझ रही हूँ,
जीवन के हर पहलू को करीब से परख रही हूँ।
रास्ते बदलकर फिर उठ रही हूँ,
पहले से कुछ बदली सी,
अब फिर खुद को समझ रही हूँ।
अब डर नहीं मंजिल का,
न पथ पर फैले काँटों का।
अब मैं अपराजिता बन गई हूँ।
अब न डर चुनौती का,
न चिंता परिश्रम की।
न भय समय के चक्र का,
न चिंता किसी और बात की।
क्योंकि अब प्रभु पर सब सौंप दिया,
जो न था अपने बस में,
वो परमात्मा के चरणों में अर्पित कर दिया।
पहले से कुछ अधिक समझदार बन गई हूँ।
धैर्य और संघर्ष का कवच धारण कर,
विष्णु के सुदर्शन चक्र सी तेजस्वी बन गई हूँ।
और लक्ष्मी जैसी शांत और स्थिर बन गई हूँ।
पहले से मैं कुछ बदल गई हूँ।