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घर को घर

Kapil Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तमाम उम्र जो खुद को थकाए रखता है,
        
                                                    
                            
वो बाप है जो घर को घर बनाए रखता है।

कभी न देखा जिसे रोते हुए जमाने में,
वो दिल में दर्द का दरिया छुपाए रखता है।

मैं अपनी ऊँची उड़ानों पे नाज़ करता हूँ,
मगर वो नीव है जो मेरा सर उठाए रखता है।

मेरी हथेली पे सूरज चमकता रहता है,
वो शख्स धूप को बाहर भगाए रखता है।

खुदा से माँगूँ तो 'कपिल' मैं और क्या माँगूँ,
जो हाथ सर पे दुआएँ सजाए रखता है।
3 महीने पहले
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