तरक़्क़ी का कंक्रीट, यादों का कफ़न
ये जो दरख़्त हैं राहों में, सब गिराए जाएँगे,
सुना है कल यहाँ नए रास्ते बनाए जाएँगे।
तरक़्क़ी की नई गाड़ियाँ जब सरपट दौड़ेंगी,
तो कच्ची पगडंडियों के निशाँ मिटाए जाएँगे।
मकाँ तो पक्के और ऊँचे बन ही जाएँगे,
मगर वो आँगन, वो नीम की छाँव कहाँ पाएँगे?
सुना है चौड़ी सड़कें निगल लेंगी वो गलियाँ,
जहाँ हम बचपन की पतंगें उड़ाया करते थे।
मशीनों का शोर जब गूँजेगा हवाओं में,
तो परिंदों के चहकने की सदाएँ रूठ जाएँगी।
विकास की दहलीज़ पर कदम तो बढ़ेंगे,
मगर पुरानी यादों की कड़ियाँ टूट जाएँगी।
ये जो धुएँ के बादल आसमाँ को घेर रहे हैं,
ये चिरागों की मद्धम रोशनी को लील जाएँगे।
आगे बढ़ने की इस अंधी, बेनाम सी दौड़ में,
हम अपनी ही जड़ों से बहुत दूर निकल जाएँगे।
अजब सी टीस है दिल में कि जो कल आने वाला है,
वो आज की मासूमियत को बहा ले जाएगा।
अगर विकास होगा, तो विकास से जुड़ी पीड़ा भी होगी,
ये चमचमाता शहर, हमारा सुकून चुरा ले जाएगा।
-कपिल देव जुल्का