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ज़रा ठहरो, कि इस कड़वे सफ़र के आख़िरी मोड़ पर

Kapil Dev Julka

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हथेली पर दुआ की धूप रख कर,
        
                                                    
                            
किसी ने उम्र भर रोपा था जिसको,
उसी इक सब्र के छोटे से पौधे को,
ज़माने ने बहुत बे-आबरू देखा।

मगर वो चुप रहा, सहता रहा सब,
कभी पतझड़ की रुसवाई, कभी यादों की परछाईं,
उसे मालूम था कि वक़्त की ज़ालिम कुल्हाड़ी भी,
कभी तो थक के बिखरेगी!

कि दिल की ख़ाक में जो ख़ून से सींचा गया पौधा,
वो इक दिन ज़ीस्त का सबसे हसीं मंज़र बनेगा,
नज़र की ओट में रहकर, मगर रूह के बहुत नज़दीक,
सुकून-ए-क़ल्ब का मख़मल बनेगा।

कहानी दर्द की अपनी ज़ुबानी वो सुनाता है,
कि 'कपिल' इस दौर में भी सब्र का परचम उठाता है,
बहुत गहरी हैं जड़ें इसकी, बहुत पाकीज़ा है मिट्टी,
तसल्ली की हवाएँ जब इसे छूकर गुज़रती हैं,
तो आँखों की उदासी मुस्कुराहट में बदलती है।

ज़रा ठहरो, कि इस कड़वे सफ़र के आख़िरी मोड़ पर,
इसी ख़ामोश शजर पर मीठे फल भी आएँगे,
तुम्हारी आँख के आँसू, जो अब तक दर्द बुनते थे,
वही कल जीत के नग़मों की सूरत गुनगुनाएँगे।
-कपिल देव जुल्का
 
23 घंटे पहले
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