मकाँ के साए, नीम की छाँव
दरख़्तों को गिरा कर रास्ते ऊँचे बनाएँगे,
मगर वो नीम के साए कहाँ से ढूँढ पाएँगे।
परिंदों से भरी शाख़ें जहाँ कल तक चहकती थीं,
वहाँ अब काँच के ऊँचे मकाँ सर को उठाएँगे।
सड़क जब चौड़ी होकर गूँजेगी गाड़ियों से अब,
गली के वो पुराने मोड़ चुपके से रुलाएँगे।
तरक़्क़ी की चमक आँखों को अंधा कर तो देगी पर,
दिलों में जो अंधेरे हैं, उन्हें कैसे मिटाएँगे?
विकास आएगा तो अपनी वो पीड़ा भी लाएगा,
नदी को रोक कर जो बाँध हम कल को बनाएँगे।
दौड़ में शहर की हम सब बहुत आगे तो निकलेंगे,
मगर अपनी जड़ों से दूर कितने छूट जाएँगे।
चमकते शहर की इस भीड़ में खो जाओगे 'कपिल',
जो गुज़रा वक़्त है, उसको कहाँ से ढूँढ लाएँगे।
-कपिल देव जुल्का