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राहें हमवार हुईं और फासले भी बहुत सिमट गए मगर,

Kapil Dev Julka

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मकानों के कद्र बढ़े, तो दरख्तों के साए छोटे हो गए,
        
                                                    
                            
तरक्की के इस अंधाधुंध खेल में, हम अंदर से खो गए।

लोहा मुस्कुराया बहुत, और पत्थर भी संवर गया यहाँ,
पर वो जो मिट्टी के सोंधे वादे थे, न जाने किधर खो गए।

ऊंची इमारतों ने छू तो लिया है आज आसमान को मगर,
परिंदों के आशियाने और उनके सुकूँ, हवा में ओझल हो गए।

सड़कों की इस बेहिसाब चमक में गाड़ियां तो दौड़ती हैं,
मगर धूल उड़ने से वो मासूम से ख्वाब, अब धुंधले हो गए।

राहें हमवार हुईं और फासले भी बहुत सिमट गए मगर,
अपनों की बाहों के जो प्यारे घेरे थे, वो अब फीके हो गए।

अगर आगे बढ़ना है 'कपिल', तो ये भारी कीमत भी चुकानी होगी,
तरक्की के हर दौर में, इंसानी जज्बात थोड़े दर्दभरे हो गए हैं।
-कपिल देव जुल्का
 
22 घंटे पहले
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