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बांसुरी का फ़ैसला

Kapil Dev Julka

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हवा के होंठों पे रखकर जिसे वो गुनगुनाता था,
        
                                                    
                            
जो इक सुरीली सी बात थी... वो प्यार ही तो था!
यकीं मानो...
अगर ये जंग महज़ वहशत, महज़ बेमानी होती,
तो उँगलियों से वो शोलों के ताने-बाने न बुनता,
वो कान्हा... अपनी बांसुरी कभी दांव पर न रखता।

कुरुक्षेत्र की उस धुआं-धुआं सी शाम में,
रथ के पहिये पे झुकी उदास परछाइयों ने पूछा था—
"हे सांवरे! तुम तो सिर्फ तान छेड़ना जानते थे,
फिर तीरों की इस झंकार में क्यों खो गए?"

वो मुस्कराया... बहुत हौसले से, बहुत धीमे से,
और उसकी रेशमी आवाज़ में इक दर्द सा चमका:
"सुनो... जब सच का गला घोंटा जाने लगे,
और अदालतें अंधों की मानिंद बहरी हो जाएं,
तब सुरों को भी हथियार होना पड़ता है,
गीता का हर इक लफ़्ज़... बांसुरी का ही अगला राग है।"

वो जो यमुना के किनारे, कदम की शाख पे बैठकर,
राधा के आंचल में संदल की खुशबुएं भरता था...
वो महाभारत के मैदान में, घोड़ों की टापों के बीच,
अर्जुन की सहमी हुई रूह को थपकियां दे रहा था।

युद्ध... किसी ज़ालिम का शौक़ तो हो सकता है,
पर जो बांसुरी बजाना जानता है,
वो लहू बहाने के लिए रथ पे नहीं बैठता।
वो तो बस... इंसानियत की उखड़ती हुई सांसों में,
एक आखिरी, मुकम्मल और सच्चा सुर भरने आता है।

तो सोचो...
अगर ये जंग महज़ एक तबाही होती,
तो वो सुरीला सा चरवाहा,
सुदर्शन उठाकर इतिहास का रुख़ न बदलता...
युद्ध गलत होता...
तो वो बांसुरी बजाने वाला, कभी युद्ध न करता।


 
एक महीने पहले
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