नुक्ते शब्दों के मायने बदल देते हैं,
हर शक्ल को एक नया वजूद देते हैं।
आसमान, हवा, पानी और रुत में,
नुक्ते का असर है।
हर साज़, ग़ज़ल, आवाज़ और ख़ामोशी में,
नुक्ते का मिज़ाज है।
हर उम्र, हर जश्न, हर ख़ुशी, हर ग़म में
नुक्ते का अंदाज़ है।
नुक्ता हो तो वही लफ़्ज़,
कुछ और कहता है,
न हो तो कुछ और।
नुक्ता सिर्फ़ लफ़्ज़ में नहीं,
शख़्सियत में भी होता है।
एक सही नुक्ता, मायना ही नहीं बदलता,
इंसान को उसके रब के, और क़रीब कर देता है।
जवानी में जो ख़्वाब चुने थे,
काश उम्र की शाम तक, वही मेरे ख़्वाब रहें।
और जो मलाल हैं, काश उनका मलाल होना भी सही निकले।
मेरे ख़्वाबों के नुक्ते, मेरी शख़्सियत से समझौता न करें,
और मेरे मलालों के नुक्ते भी, मुझे मुझसे दूर न करें।
क्योंकि नुक्ता छोटा है,
मगर फ़र्क़ बहुत बड़ा है,
एक जगह हो तो लफ़्ज़ मुकम्मल,
दूसरी जगह हो तो मायने और।
शायद इसलिए,
इंसान की पूरी उम्र,
नुक्ते को सही जगह रखने,
और उसकी सही आवाज़ पहचानने में,
गुज़र जाती है।