हमारे लोग दफ्तर जाते,
कुर्सी खाली रहती फिर भी,
बड़े साहब के आगे दुनिया,
बैठे बिना ही लौटे जल्दी।
बड़े लोग इंसानों जैसे
कितने आगे बढ़ नहीं पाए,
पर पेटों का कद कुछ ऐसा
कुर्सी पर भी समाए न समाए।
हमारे लोग वहाँ भी खड़े थे
जहाँ चीजें लेने लोग गए,
हाथ जुड़े, नज़रें झुकीं,
पर झुकते-झुकते खुद सँवर गए।
शायद इसीलिए गाँव-गली में
चेहरे उनके हँसते दिखते,
कमरों की कुर्सी छोड़ के भी
मन के भीतर स्वस्थ दिखते।
-कन्हैया लाल मीणा