जहाँ गली-गली में नेता घूमें,बनकर भ्रष्टाचारी, लुटेरा।
जनता का हक़ जो लूट के खाएँ,कहते फिरें ... "देश मेरा।"
जहाँ मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे,बन जाएँ वोटों का बसेरा।
मज़हब की दीवारें ऊँची हों,और नफ़रत डाले डेरा।
ये कैसा देश मेरा
जहाँ धोती, टोपी, कुर्ते वाले,रोज़ सजाएँ नया बखेड़ा।
रोटी, शिक्षा, रोज़गार छोड़,वादों का बाँधें सेहरा।
जहाँ शहरों, गलियों के नामों पर,हर दिन होता नया बखेड़ा।
जनता पूछे...काम कहाँ है?सत्ता दिखाए बस चेहरा।
ये कैसा देश मेरा
जहाँ रिश्वत से खुलते दरवाज़े,और ईमानदारी पर पहरा।
मेहनत करने वाला झुकता जाए,बेईमानी का हो सवेरा।
जहाँ वर्दी पर उठते सवाल,और न्याय ढूँढ़े बसेरा।
निर्बल डर-डर कर जीता हो,बलवान जमाए डेरा।
ये कैसा देश मेरा
जहाँ मीडिया चौथा स्तंभ कहाए,पर शोर का डाले घेरा।
सच्चाई की आवाज़ दब जाए,और बहसों का लगे मेला।
जहाँ किसान पसीना बोता है,फिर भी दुखों का है डेरा।
युवा लिए डिग्रियाँ हाथों में,ढूँढ़े रोज़ी का सवेरा।
ये कैसा देश मेरा
पूछ रहा हूँ भारत माँ से,कब बदलेगा ये चेहरा?
कब न्याय मिलेगा निर्बल को,कब छँटेगा ये अंधेरा?
जिस दिन जनता जाग उठेगी,न बचेगा कोई लुटेरा।
सच फिर सिर ऊँचा करके बोलेगा,टूटेगा झूठ का हर घेरा।
ये कैसा देश मेरा
न मंदिर तेरा, न मस्जिद मेरा,सबसे ऊपर वतन है मेरा।
यही अभिमान, यही प्रण मेरा ये भारत देश है मेरा।
हाँ, ये भारत देश मेरा।
ये भारत देश मेरा...