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राहगुज़र सभी तो थे यूँ ना जाने मगर..

kamlesh ranjan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी किसी से सीधे जुड़ते कई विचार
        
                                                    
                            
कई बार ना पहचान बनाते किसी के व्यवहार
सात रंगों के सौगातों में फिर
किसी के खाली काग़ज़ से उसके त्यौहार |

रिश्तों की पोटली में कैसे सिमटते कुछ परिवार
पानी जैसी बारिश में पूरे धुलते कुछ संस्कार
रंगीन चमचमाती महफ़िलों में फिर
धीमी तो किसी के जाम पर जाम लगतार |

फास़ले के ज़ख्म को माथे में सज़ा तैयार
मुखौटों की इस कदर मेहरबानी और कई किरदार
किस्से है आने की बात कहकर ना पलटना
गवाह हैं कई आज का वादा कल का इन्कार |

शिकायतों के इस दौर में धसती और धसती दीवार
आवाजों के इस शोर में फनाह होती कई चित्कार
राहगुज़र सभी तो थे यूँ ना जाने मगर
मंजिले जुदा होने की लाखों दरकार |
-कमलेश रंजन
4 घंटे पहले
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