कभी किसी से सीधे जुड़ते कई विचार
कई बार ना पहचान बनाते किसी के व्यवहार
सात रंगों के सौगातों में फिर
किसी के खाली काग़ज़ से उसके त्यौहार |
रिश्तों की पोटली में कैसे सिमटते कुछ परिवार
पानी जैसी बारिश में पूरे धुलते कुछ संस्कार
रंगीन चमचमाती महफ़िलों में फिर
धीमी तो किसी के जाम पर जाम लगतार |
फास़ले के ज़ख्म को माथे में सज़ा तैयार
मुखौटों की इस कदर मेहरबानी और कई किरदार
किस्से है आने की बात कहकर ना पलटना
गवाह हैं कई आज का वादा कल का इन्कार |
शिकायतों के इस दौर में धसती और धसती दीवार
आवाजों के इस शोर में फनाह होती कई चित्कार
राहगुज़र सभी तो थे यूँ ना जाने मगर
मंजिले जुदा होने की लाखों दरकार |
-कमलेश रंजन