कुछ नहीं हो सकता
उजाले से अंधेरे में जाकर
देखना है भीतर-बाहर तो
देखो पूरी रोशनी में आकर
पूर्वाग्रह से भरा अंधेरा
चारों ओर युद्ध का डेरा
टूटी धड़कन टुकड़ा-टुकड़ा
बोझिल शब्द से बनता मुखड़ा
कोई उठकर खड़ा नहीं होता
सिर्फ़ मेरिटोक्रेसी पर अड़ा नहीं होता
बहस बाज़ीगर करता घमासान
नाक़ाबिल क़ाबिल के धरते कान।
- कामिनी मोहन