आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मेरिटोक्रेसी

                
                                                         
                            कुछ नहीं हो सकता
                                                                 
                            
उजाले से अंधेरे में जाकर

देखना है भीतर-बाहर तो
देखो पूरी रोशनी में आकर

पूर्वाग्रह से भरा अंधेरा
चारों ओर युद्ध का डेरा

टूटी धड़कन टुकड़ा-टुकड़ा
बोझिल शब्द से बनता मुखड़ा

कोई उठकर खड़ा नहीं होता
सिर्फ़ मेरिटोक्रेसी पर अड़ा नहीं होता

बहस बाज़ीगर करता घमासान
नाक़ाबिल क़ाबिल के धरते कान।
- कामिनी मोहन
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर