सुना है, खरा सोना नरम होता है,
हर चोट से थोड़ा बेबस होता है।
जब की जाए उसमें थोड़ी मिलावट,
तभी वह आभूषण बन पाता है।
मैं भी शायद कुछ ऐसा ही हूँ,
अपने ही स्वभाव में थोड़ा कच्चा हूँ।
नरमी मेरी बार-बार मोड़ देती है,
ज़रा-सी चोट भी मुझे तोड़ देती है।
सोचता हूँ, अब थोड़ा बदल जाऊँ,
अपने भीतर थोड़ी कठोरता लाऊँ।
हर बात पर यूँ झुकना छोड़ दूँ,
खुद में थोड़ा मिलावट कर ही लूँ।
पर फिर ख़याल आता है मन में,
क्या बुराई है इतना नरम होने में?
बस इतनी-सी मिलावट ख़ुद में कर लूँ,
कि झुकना सीखूँ, मगर टूटना छोड़ दूँ।
—कमल किशोर झा