मन की खिड़की खुली रखो,
विचारों को आने-जाने दो।
भले ही हर विचार को न थामो,
न हर भाव को अपनाओ।
खिड़की ऐसी भी न हो
जैसे होटल के कमरे की—
सजावट पूरी, पर्दा सुंदर,
पर धूप रुकी हो चौखट पर ही।
पर्दा थोड़ा हटने दो,
मन में उजियारा उतरने दो।
जो बाहर है, उसे आने दो,
जो भीतर है, उसे निखरने दो।
—कमल किशोर झा