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ममता की छाया

kamal jha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी छप्पर बन वर्षा की नम बूंदों से,
        
                                                    
                            
कभी चप्पल बन कांटों की चुभन से।
खतरों में कभी ढाल बन हमें बचाती,
कभी मां, कभी बन जीवन-संगिनी।

सपनों की डोर बुनती रातों जागकर,
हमें आगे बढ़ाती, खुद को रोककर।
आंसुओं का सागर पीती मौन होकर,
दर्द को छुपाती, मुस्कान बिखेरकर।

उड़ान देती पंख बनकर ऊँचे आकाश में,
सहारा देती डगमगाते कदमों को थामकर।
अंधेरों में प्रकाशित करती स्वयं जलकर,
सांसों में बसी, जीवन का आधार बनकर।

नारी तू तो वह चमत्कार है अनघट्ट,
जो हर रूप धारण करती बिना थके।
तेरी ममता की छाया में फलते हम,
तुझसे ही खिले जीवन के फूल सदा।
—कमल किशोर झा
7 महीने पहले
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