ऐ तकदीर! कभी तो पूछ लिया कर तू भी अपनी खुशी,
क्यों हर बार बस दूसरों की खुशियों को मिटाने में लगी?
तूने आजमाया है हमेशा इस बेदर्द जमाने की नीयत को,
कभी अपनी इस आजमाइश का रुख मोड़ कर तो देखती।
चंद बिखरे हुए दुखियारों को तो थोड़ा छोड़ देती,
उनके सूने आंसुओं से अपना दामन न भिगोती।
तू भी चौखट ढूंढती है तो बस उनकी, जो पहले से सूनी हैं,
जहाँ उम्मीदें दम तोड़ चुकीं और आँखें बस रोती हैं।
कभी कदम रख कर देख उन ऊँची दहलीजों पर भी,
जहाँ गुरूर का साया है और तिजोरियाँ भरी हैं।
आज़मा कभी उनको भी, जिनके पास महलों के साये हैं,
फिर देख कि क्या वो भी तेरी मार सह पाते हैं?
ऐ मुकद्दर, कभी तो इंसाफ की एक नई लकीर खींच,
सिर्फ गरीबों के जख्मों को अपनी बेरुखी से मत सींच।