मसरूफ दुनिया में अलग सी उलझन नज़र आई
दुनिया भर की यादों से गुज़री फिर भी
इस उलझन से कहा मिली रिहाई
शब भर छत पर तारों के नीचे अकेले बिताई
फिर हलचल कुछ कहीं आहट सी दी सुनाई
दुनिया की नज़रे होती है मुझ पर फिर
मैं खुद की नज़र में कैसे नहीं आई
दुनिया का नक़ाब देखते- देखते
मुझे अपनी ही सूरत धुंधली सी नज़र आई
चंद दिखावटी पलो के खातिर
मैंने ना जाने कितने पलो की ज़िन्दगी गवाई
अब जब खौफ से लड़ना सीख गयी
फिर क्यूँ हर आहट पर मुझे
सांँसो की, धडकनों से रेस होते दी सुनाई
मुस्कुराती नहीं गम छुपाने के लिए
ना खुशी दिखाने के लिए
एक अदा मेरी ये भी है कुछ फर्ज़ी सवालतो पर तेरे
तुम को बेवकूफ बताने के लिए
एक इल्ज़ाम मुझ पर अब ये भी लगा दो
मैं कत्ले-आम कर आई हूँ
पन्नों पे एहसासों की कब्र बना आई हूँ ...
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