खाार नहीं करते वो मुझसे इश्क़ करते हैं
वो मेरी रूह को नहीं, मेरे जिस्म को तकते हैं
वो सिंदूर लाल लगा कर मुझे लहूलुहान करते हैं
हां वो मेरे बदन पर इश्क़ की निशानी देते हैं
मैं उसकी जायदाद हुई इसकी वसीयत ज़ुबानी देते हैं
वो निर्वस्त्र कर मुझे अपनी हवस की लाज बचाते हैं
उसका इश्क़ मेरी सहमति के आड़े आता हैं
मेरी रूह की अर्थी पर अपने इश्क़ की सेज सजाते हैं
वो मेरे जिस्म को नोच कर, चीर कर, मार कर, काट कर इसे इश्क़ बताते हैं
वो दरिंदा मुझे बाहर आबरू संभालने का सबक सिखाता है
हां वो ऐसे ही इश्क़ जताता है
वो खुद को मर्द बताता है
वो मुझको बस एक मामूली औरत बताता है
वो यूँ चूटकियाँ बजाके अपनी फरमाइशें बतलाता है
हां वो मेरा पति कहलाता है
हां वो दुनिया को तो यही बताता है
वो सुबह- शाम, दिन - रात अपनी चलाता है
हां वो इसी तरह इश्क़ जताता है
शादी ने दिए रिश्ते को नहीं जिस्म को अपनाता है
हां वो मेरा पति कहलाता है
वो यूं ही इश्क़ जताता है...
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।