कफ़न बांध सर पे वो दीवाने से आए थे
माटी मां की ख़ातिर वो मुस्कुराने आए थे।
आंखों में आजादी, सीने में आजादी लिए,
भारत माता की आज़ादी का वो ख़्वाब सजाने आए थे।
बचपन में देखी थी गुलामी की वो रात,
मां भारती के आंचल में सिसकती हर बात।
जलियांवाला की धरती ने जिस लहू को पुकारा,
उस पुकार ने जगा दिया आजादी का अंगारा।
नन्हें से मन में तब सिर्फ एक संकल्प जगा,
“अब देश होगा आज़ाद” ऐसा एक दीप जला।
न अपना सुख मांगा, न जीवन की आस,
वतन की राह चुनी, वतन ही था उनका विश्वास।
कफ़न बांध सर पे वो दीवाने से आए थे
माटी मां की ख़ातिर वो मुस्कुराने आए थे।
आंखों में आज़ादी, सीने में अरमान लिए,
वो अपना सर्वस्व देश पर लुटाने आए थे।
हाथों में किताबें थीं, आंखों में विचार,
कलम से जगाते थे सोया हुआ संसार।
इंक़लाब की गूंज से कांप उठी हर दीवार,
युवाओं के दिल में भर दिया नया विचार।
असेंबली में गूंजी जब वह बुलंद आवाज़,
सोए हिंदुस्तान को मिला जागने का राज।
धुआं था मगर संदेश बहुत साफ़ था
अन्याय के आगे झुकना हमें स्वीकार नहीं था।
जेल की अंधेरी रातें भी राह न रोक सकीं,
भूख की तपती ज्वालाएं उन्हें न झुका सकीं।
सलाखें थीं सामने पर मन आजाद था,
हर सांस में बसता भारत आबाद था।
मौत सामने आई तो हंसकर कह दिया,
“जीवन क्या है? इसे वतन के नाम कर दिया।”
राजगुरु और सुखदेव थे साथ उस घड़ी,
तीनों ने लिख दी अमर बलिदान की लड़ी।
कफन बांध सर पे वो दीवाने से आए थे,
माटी मां की ख़ातिर वो मुस्कुराने आए थे।
फांसी के फंदे को भी हंसकर गले लगाया,
भारत मां की गोद में अमर होने आए थे।
तेईस मार्च की वो शाम भुला पाएगा कौन,
उन वीरों के बलिदान को मिटा पाएगा कौन?
जिस उम्र में सजते हैं सपनों के महल,
उस उम्र में दे दिया वतन को अपना कल।
वो चले गए मगर मशाल जला गए,
आने वाली पीढ़ियों को राह दिखा गए।
उनका हर विचार आज भी आवाज़ देता है
देश के लिए जीना ही जीवन का अर्थ होता है।
नमन उस वीर जवानी को,
नमन उस बलिदानी को।
नमन उस अमर कहानी को,
नमन हिंदुस्तान की शान को।
-ज्योति वर्मा