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अपने भाग्य की रेखाओं में

Jyoti Verma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            माटी के पुतले
        
                                                    
                            
कहीं तोड़े गए
कहीं पूजे गए,
जीवन के मेले में
न जाने कितने रंग
आ के चले गए!
कभी मान मिला
कभी ठोकर मिली,
अपने भाग्य की रेखाओं में
बहुत कुछ छूट गया!
माटी की देह लेकर
सब आये हैं यहां,
न कोई सदा राजा
न कोई सदा फकीर यहां!
जो कल शिखर था
वो आज धूल यहां,
समय के हाथों से
सब बदल जाता यहां।
फिर अभिमान किस बात का
सब क्षणभंगुर यहां,
क्यों बांटें किसी को आकार से
प्रेम से जी लें
प्रेम ही देकर जाएं यहां!
बस यही अर्थ है
बस यही तर्क है
इस माटी के अवतार का!
माटी के पुतले...

ज्योति वर्मा
एक महीने पहले
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