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विवाह से इतर एक विचार

Junaid Ahmad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            "विवाह से इतर एक विचार"
        
                                                    
                            

मैं पुरुष हूं,
मगर विवाह के बंधनों में बंधना नहीं चाहता
किसी की प्रेमिका को
किसी रिश्ते के नाम पर अपना करना नहीं चाहता।

मैं नहीं चाहता
कि किसी की मजबूरी का मोल लगाऊं,
ना किसी के अधूरे सपनों को
अपने भविष्य की नींव बनाऊं।

मैं नहीं चाहता
किसी मां-बाप के कलेजे के टुकड़े को
उसके अपने घर से दूर करूं,
ना किसी बेटी को
रिश्तों की रस्मों में बांधकर
उसकी उड़ान छीनू।

मैं नहीं चाहता
किसी को समाज के बनाए
पिंजरे में रखकर
उसे प्रेम का नाम दूं।

ना किसी के शरीर को
अपनी इच्छाओं की कीमत पर तौलना चाहता हूं,
ना किसी की देह को
अपने अधिकार की वस्तु समझना चाहता हूं।

मैं नहीं चाहता
अपने कल की सुरक्षा के लिए
किसी के आज की खुशियां छीन लूं,
ना अपनी जिंदगी संवारने के लिए
किसी और की जिंदगी उलझाऊं।

शायद इसलिए
मैं विवाह से भागता हूं
बस उस रिश्ते से दूर रहना चाहता हूं
जहां प्रेम से पहले
समाज, अपेक्षाएं और अधिकार खड़े हों।

मैं अकेला रह लूंगा,
मगर किसी की आज़ादी की कीमत पर
अपना घर नहीं बसाऊंगा।

क्योंकि मेरे लिए
साथ का अर्थ किसी को पाना नहीं,
बल्कि इतना सम्मान देना है
कि वह मेरे साथ हो या ना हो
अपनी ज़िंदगी अपनी इच्छा से जी सके
-जुनैद अहमद
2 महीने पहले
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