गीत - मारो जमी पे पाँव के पानी निकल पड़े
बेमतलबी है दुनिया चिढ़ाती जरूर है,
कुछ कर गुजरने की ज़िद, मेरा क्या कुसूर है।
लोगों का काम कहना हम आगे को चल पड़े,
मारो जमी पे पाँव के पानी निकल पड़े।। - 2
दुनिया में यूं हजारों किस्से जरूर हैं,
पराये हो जाते अपने पर अपने ही दूर हैं।
रिश्तों की बान छोड़ आ आगे को बढ़ चलें,
मारो जमी पे पाँव के पानी निकल पड़े।। - 2
दुनिया है बड़ी जालिम सताती जरूर है,
कहने के लिए अपना बताती जरूर है।
राहों में बड़े शोले चाहे पांव जल पड़े,
मारो जमी पे पाँव के पानी निकल पड़े।। - 2
बस एक हो मंजिल और एक हो निशाना,
रुकना न कभी राही बस चलते चले जाना।
आएं हजारों विपदा चाहे जां मचल पड़े,
मारो जमी पे पाँव के पानी निकल पड़े।। - 2
- दुर्गेश बहादुर प्रजापति