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जो बीत गए

Journalist &

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अभी कुछ समय पहले यहीं थे,
        
                                                    
                            
अब नहीं हैं ....
अब उनके किस्से-कहानियां
और उनकी यादें ही लोगों के मुख से
बखानी जा रही हैं।
उनके समय की बातें,
उनके पीढ़ियों की बातें,
जो हमें बहुत कुछ सोचने पर
मजबूर करती हैं,
अब किस्से का ले चुकी हैं रूप।

हां मैंने देखा है बाबा (दादाजी) को,
उनके जीवन को...
माना वह ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे,
लेकिन अपने काम का हिसाब
वह बखूबी रख लेते थे।
इतने कलाकार थे कि सब काम
अपने हाथों ही कर लेते थे।
किसी की जरूरत ही नहीं पड़ती थी।
चाहे वह खपड़ैल का घर बनाना हो, या
बारिश में पानी टपकने पर उसकी मरम्मत करना।

जब हम पढ़ने जाते थे,
तो साइकिल के पंचर हो जाने पर
वह खुद ही पंचर बनाते,
कहते कि जब घर में सब सामान है,
तो क्यों फालतू का खर्च करना।
एक बार तो हमें लगता कि बाबा कंजूस हैं,
इसलिए पैसा देने के बजाय
खुद ही पंचर बना देते हैं।
लेकिन जब हम खुद पंचर बनाना सीख गए,
तब समझ आया कि हमें अपनी विरासत
सिखाने के लिए वह ऐसा करते थे।

इतना ही नहीं, वह खुद ही
मोची का भी सारा काम कर लेते थे,
चप्पल या जूते सिलना हो, बैग सिलना हो..
उनके पास सारे औजार होते थे।
वह बढ़ई से लेकर मिस्त्री (थावई) का काम भी
बखूबी जानते थे और
घर पर लगे प्लांट को भी
अकेले ही संभालते थे।
ऐसे थे बाबा...

गांव में किसी को बिच्छू डंक मार दे,
तो रात के कितने भी बज रहे हों,
वह भागे-भागे सबसे पहले
बाबा के पास ही आते।
किसी को नजर या टोना लग जाए,
तब भी बाबा के पास ही आते।
और बाबा बिना संकोच,
कितनी भी रात हो,
सबसे पहले पीड़ितों की पीड़ा हरते।
जैसे उन्हें इस काम में मजा आता हो।
शायद इसीलिए तो पूरा गांव ही नहीं,
आस पास के गांव वाले भी
उन्हें प्यार से बाबा कहकर पुकारता।

वह हर शनिवार बाजार जाते,
तो शाम में हम सभी उनकी राह तकते।
बाजार से लौटकर वह हम सबके लिए
कभी जलेबी, कभी मोमफली (मूंगफली),
कभी खुरमा, कभी बतासे....
हमेशा कुछ न कुछ जरूर लाते,
और हम बड़े चाव से खाते।
इसीलिए तो बाबा हमसब के इतने प्यारे थे...

वह अकेले रात भर गांव के बाहर
दूर कब्रिस्तान के पास डाड़ी पर
मौसमी फसलें रखाते,
और सुबह हम सबको अपनी रात बीती-
भूतों की रसभरी कहानियां सुनाते।
हम सब बाबा का ये हठपन देख
हतप्रभ रह जाते...

विश्वास ही नहीं होता कि
वह कैसे अकेले भूतों के बीच रह लेते हैं।
वह कहते कि रात में भूत मुझे तरह-तरह की
आवाजें निकालकर डराते हैं।
जब भूत मुझे डराने आते हैं,
तो मैं उनसे कहता हूं कि मेरे पास क्या रखा है,
जाओ अपने धाम अपना काम करो,
और मुझे अपना काम करने दो...
मैं तुमसे डरने वालों में से नहीं...
और वह पीछे मुंह भाग जाता।

बाबा की ये निडरता ही हमें
शक्ति और ऊर्जा देती और निडर बनाती...
तब मुझे नहीं समझ आता था,
लेकिन अब जब वह सब बातें जेहन में आतीं हैं,
तब अहसास होता है कि
उन्हीं की निडरता से आज मैं
इतना हिम्मतवाला बन पाया हूं,
उन्हीं की निडरता ने
मुझ पर इतना प्रभाव किया,
कि कहीं भी कितनी ही रात हो,
बेहिचक निडर होकर चला जाता।

रात में खेत में पानी चलाना हो तो
अकेले साइकिल से चला जाता,
कॉलेज टाइम पर रात के दस बजे ट्रेन आती,
तो स्टेशन से आठ किलोमीटर दूर
घर अकेले चला जाता...
ये निडरता कहीं न कहीं उन्हीं से
विरासत में मिली थी मुझे....

जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया,
मुझमें वह निडरता बढ़ती गई।
और आज भी जब भी बाबा को याद करता हूं,
जैसे उनकी वह ऊर्जा, वह शक्ति
अब भी मुझमें जिंदा है।
उनकी वही ऊर्जा मुझे आगे बढ़ने की
शक्ति और हिम्मत देती है। ....
-दुर्गेश बहादुर प्रजापति
2 वर्ष पहले
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