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ज़ीस्त वो मर्ज़ जिसकी दवा ही नहीं

Johnny Ahmed

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ज़ीस्त वो मर्ज़ जिसकी दवा ही नहीं
        
                                                    
                            
ठीक हो पाया कोई सुना ही नहीं

देखों अख़बार में झूठ सब छप गया
सच बेचारा कहीं भी छपा ही नहीं

सिर्फ़ पेड़ों को वो देखता रह गया
इसलिए उसको जंगल दिखा ही नहीं

बस वही इल्म असली है जो ये कहे
इल्म तुमको किसी बात का ही नहीं

जो न हो पाया थोड़े से ही मुतमइन
ज़्यादा पाके भी वो ख़ुश हुआ ही नहीं

आज जो कल है वो आज बन जाएगा
जिसको कहते है कल वो मिला ही नहीं

'क़ैस' दुनिया में ऐसा कोई भी नहीं
कह सके आजतक दिल दुखा ही नहीं
-जॉनी अहमद क़ैस
एक घंटा पहले
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