ज़ीस्त वो मर्ज़ जिसकी दवा ही नहीं
ठीक हो पाया कोई सुना ही नहीं
देखों अख़बार में झूठ सब छप गया
सच बेचारा कहीं भी छपा ही नहीं
सिर्फ़ पेड़ों को वो देखता रह गया
इसलिए उसको जंगल दिखा ही नहीं
बस वही इल्म असली है जो ये कहे
इल्म तुमको किसी बात का ही नहीं
जो न हो पाया थोड़े से ही मुतमइन
ज़्यादा पाके भी वो ख़ुश हुआ ही नहीं
आज जो कल है वो आज बन जाएगा
जिसको कहते है कल वो मिला ही नहीं
'क़ैस' दुनिया में ऐसा कोई भी नहीं
कह सके आजतक दिल दुखा ही नहीं
-जॉनी अहमद क़ैस