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सुर को दुख ,असुर को सुख बस यही है कलियुग

Jitendra Odwani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ईर्ष्या चढ़ गई उस पर भी,
        
                                                    
                            
जो संग कभी खेलते थे,
अपनापन भी न रहा,
जो कभी जान देते थे।
जरूरत थी तो सब अपने थे,
निकल गई तो गैर कहलाए,
जीत गए तो संग थे सभी,
हार गए तो ताने सुनाए।
स्वाभिमानी काट रहे वनवास अब भी,
धन के अभिमानी सेठ कहलाए।
हर युग में चक्रव्यूह रचे अपनो ने ही,
जो बच गए वो अर्जुन,
जो फंस गए वो अभिमन्यु कहलाए।
युग बदलते है काल चक्र वही है,
खेल विधाता का अब भी वही है,
असुर जीवन भर सुख में रहते,
अंत बड़ा भयंकर पाए,
जो ईश्वर का नाम जपे,
दुख मिले जीवन भर उसे,
पर वो अंतिम क्षण भगवान को पाए।
4 दिन पहले
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