विज्ञापन

कर्म का फल

Jitendra Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उस मां की ममता भूल गये?
        
                                                    
                            
जो मलद्वार तुम्हारा धोयी थी।

तुझे चोट खरोच आ जाने पर,
ओ फफक फफककर रोयी थी।

तुझे साथ मे लेकर सोती थी,
तुम बिस्तर गीलाकर रोते थे।

तुझे उठा सीने से लगाकर ,
ओ खुद गीले में सोयी थी।।

तुझे चूम सीने से लगाकर,
कितने ख्वाब सजोई थी।।

ओ प्यार लुटाती थी तुझपर
पर तूने अच्छा सिला दिया,

जो रोने पर शांत कराती थी।
तूने उसको ही रुला दिया।।

दौलत शोहरत कितनी भी हो,
बिन मां के सदा अधूरा है।

जीवन देने वाली के बिन,
कैसे जीवन तेरा पूरा है।

जुल्म करो मिल बीबी संग,
बच्चे तेरे सब देख रहे हैं।

दादी कब कब कैसे रोयी,
समझ रहे सब सीख रहे हैं।।

तेरे बच्चों का दिन आएगा,
जब तेरा दुर्दिन आएगा।।

तब बच्चों को कैसे समझोगे,
जब बच्चा तुमको ठुकरायेगा।।

जितेंद्र मिश्र वाराणसी

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all