मेरे देश के जवानों की बात है निराली
देश के वास्ते खेलते है ये खून की होली।
शीश उँचा करके चलाते हैं गोली,
डर के भागते हैं इनसे दुश्मन की टोली।
सीमा पे रहके भूलते हैं घर की गली
याद नहीं रहता इन्हें खिलाये थी जो प्यार की कली
बिसरा देते हैं ये माँ की भी लोरी।
शीश उँचा करके चलाते हैं गोली
डर के भागते हैं इनसे दुश्मन की टोली।
अंधेरे में मनाते हैं हौसले की दीवाली।
क्या सुनाऊं मैं इनकी कहानी
ये आज की बात नहीं
ये बात है पुरानी।
शीश उँचा करके चलाते हैं गोली
डर के भागते.............
लहु -लुहान होके बनाते हैं ये वीरता की रंगोली
भारत माँ की चरणों में कुर्बान कर देते हैं जिन्दगानी
मौत का इनको खौफ नहीं बोलते हमेशा प्यार की बोली।
शीश उँचा करके चलाते हैं गोली
डर के भागते.................
हर त्यौहार, हर खुशीयाँ देश की सेवा में ही मना ली।
हँसते -हँसते हर जंग जीती, रोने की तो बात भुला दी।
सौगंध जो खायी वो मर-मिट के भी निभाली ।
शीश उँचा करके चलाते हैं गोली।
डर के भागते..........................
झिलमिल यादव
गिरिडीह (झारखण्ड )
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