विज्ञापन

कल-कल सरिता बहती

Jhilmil Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कल-कल सरिता बहती
        
                                                    
                            
अपने जल से खेतों को सींचती।
हरियाली गाँवो में लाती
इसके ही जल से खेतों में फसलें लहराती।

टूटती,बिखरती चलती रहती
खुद ही मंजिल तक पहुंचने की राह बनाती।
चट्टानों से भी सामना है करती
अपने दिल का न कभी किसी को हाल सुनाती ।

श्रावण हो या ज्येष्ठ का मौसम
हँसती रहती न होती गुमसुम
कूड़े -कचरे सब इसमें बहाते
फिर भी ये न किसी पे उंगली उठाती।

सब घर -आँगन को स्वच्छ रखते
पर सरिता के तट को विसरा देते
जब मौका आता है पावन पर्व का
तब सरिता कि तट सबको याद आती।

कब-तक ये सिलसिला चलेगा
सरिता को कब न्याय मिलेगा
या यूँही सदा रहेगी बहती
अपने दर्द को चुपचाप रहेगी सहती।


झिलमिल यादव
गिरिडीह (झारखण्ड)


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
7 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

RATAN KUMAR

613 कविताएं

View Profile

Rajiv Tyagi

423 कविताएं

View Profile

Anil Kumar

4215 कविताएं

View Profile