कल-कल सरिता बहती
अपने जल से खेतों को सींचती।
हरियाली गाँवो में लाती
इसके ही जल से खेतों में फसलें लहराती।
टूटती,बिखरती चलती रहती
खुद ही मंजिल तक पहुंचने की राह बनाती।
चट्टानों से भी सामना है करती
अपने दिल का न कभी किसी को हाल सुनाती ।
श्रावण हो या ज्येष्ठ का मौसम
हँसती रहती न होती गुमसुम
कूड़े -कचरे सब इसमें बहाते
फिर भी ये न किसी पे उंगली उठाती।
सब घर -आँगन को स्वच्छ रखते
पर सरिता के तट को विसरा देते
जब मौका आता है पावन पर्व का
तब सरिता कि तट सबको याद आती।
कब-तक ये सिलसिला चलेगा
सरिता को कब न्याय मिलेगा
या यूँही सदा रहेगी बहती
अपने दर्द को चुपचाप रहेगी सहती।
झिलमिल यादव
गिरिडीह (झारखण्ड)
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