फागुन में जब आई होली
दुकानों में लगी पिचकारीयों की लरी
रंग-बिरंगे बिक रहे गुलाल
बच्चे चिल्ला रहे आई होली, आई होली।
रामू ने रंग-बिरंगे कूरते मंगवाई
छोटी भी लाल चूनरीया लाई।
दीपू नाच रहा हाथों में ले पिचकारी
सोनी भी खुशी से हैं इठलाई।
माँ ने रासन ढेर सारे हैं मंगवाई
चाची ने पकवानों की सूची बनाई।
बुआ ने चूल्हे पें चढ़ा दी कढ़ाई
भाभी से गुजिया,पुआ हैं छनवाई।
ढेर से पकवान खाये, मिठाईया खाई
सहेलीयों संग मैने भी होली मनाई।
नानी, दादी भी ने होली की गीत सुनाई
खुशी से सब झूम रहे थे
फिर मुझे परीक्षा की चिंता ने सताई।
पकडा़-पकडी़, भागम-भाग
रंग-बिरंगे गुलालो से सजी गली।
गाँव में होली के गीत बजने लगी
लोगों ने राधा- कृष्ण की झांकी निकाली।
होलिका दहन किया सबने
प्रल्हद की सबको याद आई।
सबकी जीवन खुशीयों के रंगो से भर गई
सब गले-मिले ,मिटी बुराई।
चेहरा लाल, उडे़-उडे़ से बाल
रंगो से हो गया सबका हाल बेहाल।
जीजा जी ने भी अपनी कुरता सवारी
भाभी ने साडी़ कि आँचल से बाल बचाई।
शाम ढला सब हुए तैयार
साथ में चली भजनो की टोली ।
मटकी फोड़ परम्परा सबने निभाई
इसके बिना तो अधुरी हैं होली।
इन्तजार फिर रहेगा
इन सुनहरे पलों का
दूर को पास बुलाती
अपने से अपनो को मिलाती होली।
झिलमिल यादव
गिरिडीह (झारखण्ड)
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