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कभी बालों को सहलाती

Jaykishan Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मंद मंद हवा
        
                                                    
                            
बह रही है
धीरे से कुछ
कह रही है
शर्माती मुस्कराती
अपनी मीठी लोरी सुनाती
पेड पौधों को
गले से लगाती
सूरज की किरणों को
गोद में सुलाती
सब कुछ ये
सह रही है
मंद मंद हवा
बह रही है
धीरे से कुछ
कह रही है
कभी पूरव‐पिश्चम
कभी उत्तर‐दक्षिण
तो कभी दिशाहीन
ये हो रही है
कभी माटी में खेलती
तो कभी नदी में नहाती
कभी बालों को सहलाती
तो कभी ये इतराती
यूँ ही ये
मचल रही है
जगह जगह
ये टहल रही है
मंद मंद हवा
बह रही है
धीरे से कुछ
कह रही है
एक महीने पहले
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