इस राज्य का सूरज है तू
इस प्रजा का धीरज है तू
ना त्याग राज काज को
ना त्याग प्रजा प्यार को
स्नेह का दीपक है तू
इस राज्य का शीर्षक है तू
अत्याचार है तो मिटवा दे
प्यार है तो बढवा दे
मुँह ना फेर इस जिम्मेदारी
के बोझ से
ना हो ढेर तू गोरों के रोग से
न्याय का रंग चढा ले
अपने चेहरे पे
अपना ही ढंग दिखा दे
राज्य के पहरे पे
राज मुकुट को पहनकर
राज्य सभा को जोडकर
अब गरज उठ तू
अत्याचार पे
अब बरस उठ तू
प्रजा प्यार पे
इस राज्य की नदियों
का नीरज है तू
इस राज्य का सूरज है तू
इस प्रजा का धीरज है तू