ये खुरदरापन, ये सिमटते रिश्ते,
व्यस्तता की सनक और रुपयों खनक। सिर्फ सपने देखना नहीं,
उन्हेंआकार देना चाहते हैं,
अब खरीदार नहीं ,
स्वयं बाज़ार होना चाहते हैं।
उजालों को निगल कर रात होना चाहते हैं,
शांति बन में शोर का उन्माद होना चाहते हैं।
आगे और आगे बढ़ने की ललक अच्छी है,
शिकवा ये है क्यों अतीत खोना चाहते हैं। तुम जो यह नए युग की इमारत गढ़ रहे हो,
आने वाले समय की भी इबारत पढ़ रहे हो।
गढ़ने के लिए पढ़ना,
और पढ़ने के लिए गढ़ना ज़रूरी है।
अब जरूरत है , सिमटते रिश्तों को आकार देने की,
इससे पहले कि हम बिखर जाएं ,
हम रिश्तों को आकार देना चाहते हैं!