आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

रिश्तों को आकार देना चाहते हैं!

                
                                                         
                            ये खुरदरापन, ये सिमटते रिश्ते,
                                                                 
                            
व्यस्तता की सनक और रुपयों खनक। सिर्फ सपने देखना नहीं,
उन्हेंआकार देना चाहते हैं,
अब खरीदार नहीं ,
स्वयं बाज़ार होना चाहते हैं।
उजालों को निगल कर रात होना चाहते हैं,
शांति बन में शोर का उन्माद होना चाहते हैं।
आगे और आगे बढ़ने की ललक अच्छी है,
शिकवा ये है क्यों अतीत खोना चाहते हैं। तुम जो यह नए युग की इमारत गढ़ रहे हो,
आने वाले समय की भी इबारत पढ़ रहे हो।
गढ़ने के लिए पढ़ना,
और पढ़ने के लिए गढ़ना ज़रूरी है।
अब जरूरत है , सिमटते रिश्तों को आकार देने की,
इससे पहले कि हम बिखर जाएं ,
हम रिश्तों को आकार देना चाहते हैं!
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर