दर्द की देखो यहां औकात भी है
हां कहीं पर शर्म का इक हात भी है
लोग भी क्यों बाँटते हैं सोच अपना
सोच ही क्या अब जुबां पे बात भी है
लोग जल्दी हड़बड़ाते हैं इधर के
सर्दियों में एक क्या दो रात भी है
पूछते हो यूँ रखे हो क्या दिखाओ
झांक ले दिल पाक में जज्बात भी है
देखते हैं जंग के हर चाल को अब
खेल में सब एक रंग बिसात भी है
शाम हो के जाम होने का नज़ारा
बेबसी की फिर इधर हालात भी है
हाथ कैसे आएगा हर बार बाज़ी
जीत के लिए दोस्त खाली मात भी है
दूर है कितनी गई वो वाकई में
जान बाकी तो अभी बारात भी है
धूल में ही खेल के खो दिए सब को
मुल्क में हर शहर का इक नात भी है
- जयंत
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