विज्ञापन

मुफ़लिसी

jayant patel

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हंस के गम भुला दिया जब से
        
                                                    
                            
मुस्कुराकर हवा किया जब से

यूँ हमारी हया जमीं पे है
इब्तिदा हो गयी पिया जब से

देख ले तू जरा टूटे दिल को
तोड़ते हैं उसे सिया जब से

मैं खुशी को तुम्हें दिखा पाया
उस खुदा ने मिला दिया जब से

काश अल्फ़ाज़ भी मिले तुझमें
दुश्मनी में दबा लिया जब से

जान भी जा रही इधर कब से
रौशनी दिखी,उठी ज़िया जब से

शर्म सी आ गई मुझे जबरन
सामने आ गए मियां जब से

इश्क़ में खो गया अभी सबकुछ
जान खोने लगा यहां जब से

मात जो अब 'जयंत' ने खाया
हार महसूस हो गया जब से

- जयंत पटेल

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

विजय कुमार

177 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13122 कविताएं

View Profile