शमा जमाना बुझा रहा था
हमें हवा से जला रहा था
नफ़ा नहीं था वहां ज़रा सा
दुकान फिर भी चला रहा था
दवा, दुआ सब लिए हुए
शरीर अच्छा सज़ा रहा था
उसे नुमाइश पसंद था पर
ख़ुदा खुदाई दिखा रहा था
थमा रहा मैं, यहां उसका
अवाज़ मन से बुला रहा था
जुदा हुई शहर,बाद हमसे
हमें खुदा यूं मिला रहा था
जिसे कहना पता नहीं वो
जुबां हमारा दबा रहा था
सुनी हुई जो गली हमारी
सबा वहां पास आ रहा था
भला किसे फ़िक्र थी हमारी
जिसे देखो वो सुना रहा था
'जयंत' भी कम नहीं दीवाना
धुंआ जुबां से उड़ा रहा था
-जयंत पटेल
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