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सुना रहा था

jayant patel

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शमा जमाना बुझा रहा था
        
                                                    
                            
हमें हवा से जला रहा था

नफ़ा नहीं था वहां ज़रा सा
दुकान फिर भी चला रहा था

दवा, दुआ सब लिए हुए
शरीर अच्छा सज़ा रहा था

उसे नुमाइश पसंद था पर
ख़ुदा खुदाई दिखा रहा था

थमा रहा मैं, यहां उसका
अवाज़ मन से बुला रहा था

जुदा हुई शहर,बाद हमसे
हमें खुदा यूं मिला रहा था

जिसे कहना पता नहीं वो
जुबां हमारा दबा रहा था

सुनी हुई जो गली हमारी
सबा वहां पास आ रहा था

भला किसे फ़िक्र थी हमारी
जिसे देखो वो सुना रहा था

'जयंत' भी कम नहीं दीवाना
धुंआ जुबां से उड़ा रहा था

-जयंत पटेल

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8 वर्ष पहले
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