इंसान हैं फिर भी, अभी तक मलाल है
कटा बकरा जो नीचे से, फिर हलाल है।
पेशेवर कहतें हैं वो लोग, अपने आप को
किसी ने कहा वो, ज़मीन का दलाल है।
जो हमने कह दिया हूबहू वैसे अल्फ़ाज़
तो फिर देख लो शहर में कैसा बवाल है।
दूसरों के घरों में झांकना छोड़ दे अब
अपना घर देख उधर तेरा क्या हाल है।
वज़ीर दे के प्यादों को खत्म करना
बिसात ए शतरंज में ये भी तो चाल है।
आदमी बनाये तो योजना और षड्यंत्र
जो मकड़ी नें बनाया वो भी एक जाल है।
इंसान तय करे तो है वक्त ए पाकीज़ा
इक बार खुदा तय करे तो फिर काल है।
जब दुकानदार ने दिया तो चना था
अब ख़ानसामा बनाए तो फिर दाल है।
- जयंत
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