खुशियों की पेटी चली जाएगी
शहर को समेटी चली जाएगी
उस माँ पे क्या बीतेगी जिसकी
सयानी एक बेटी चली जाएगी
लिखा न जाएगा मंज़र हमसे
प्यार को लपेटी चली जाएगी
आँसू में उसको देखा मैंने आज
खैरियत सब लेती चली जाएगी
बचपन बाकी है मन में उसके
समझ वही देती चली जाएगी
बोझिल वो रात कैसे कटेगी
जिसमें वो सोती चली जाएगी
आख़िर वक्त वो आ ही गया अब
तबस्सुम अब देती चली जाएगी
- जयंत
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।