कविता : रावण तो रावण है
मैदान में खड़ा ऊँचा रावण का
पुतला दहन उठा l
दंभी, लोभी, क्रोधी रावण का
अहंकार क्षण भर में धधक उठा ।
इस युग के इंसानी रावण का
संहार करने पुनः आओ तुम ।
कई भयानक रावण आज
इस धरती पर जन्म ले चुके ।
हे पुरुषोत्तम ! बेबस सीता की
मर्यादा को देखो जो लोग धुत्कारते ।
वे पापी, दुराचारी, निर्लज्ज,
अधर्म की मस्ती में डूब जाते ।
हे राम ! इस धरती से पाप मिटाने
पुनः अवतरित हो जाओ तुम ।
सीता को भी इस धरती पर जीने का
पुनः अधिकार दिलाओ तुम ।