कविता: नहीं हारना
रात भर की बरसात से,
से हुआ हर क्षेत्र नम ।
मिट्टी जब गीली हुई,
रास्ते बने दुर्गम ।
हर डगर पर संभलकर ,
जो गिरकर फिर उठे ।
पंक को हराकर मानव,
फिसलन से भी जीते ।।