कविता: दादाजी का एटीएम
दादाजी की पोटली,
हरदम भरी ही भरी,
लटका दी जाती थी,
घर के बड़े बरामदे में l
आने - जाने वाले हाथ,
डालकर लेते ही देखा,
न देखा कभी किसी को,
डालते पैसा उसमें l
देखने पोटली में कितने पैसे,
बहुत मेरी जिज्ञासा थी,
पर मैं स्तब्ध थी जब देखी,
रुपए-सिक्कों की भरमार उसमें l
गाँव में होती थी चर्चा,
पोटली पर दादाजी की,
मगर सेवा में जन-जन की
नहीं मिली पद्मश्री उन्हें l
लुटेरों ने चकमा देकर,
लूटा एटीएम का सारा माल,
अब दौड़ रहे हैं इधर - उधर
सब अपनी जान बचाने की l
छपी ख़बर एटीएम में चोरी की,
याद आई दादाजी की पोटली,
नहीं था कोई निगरानी करने को ,
फिर भी महफ़ूज़ थी उसमें पूरी राशि जो l
नहीं चुराए आने-जाने वालों ने,
भरोसे भरे अपने हाथों से निकाले,
माँग थी जितनी बस उतने पैसे,
माना फिर ईश का प्रसाद उसे l