बीस बरस की उम्र थी, आँखों में अरमान थे,
अनजानी राहें सामने, सपनों के आसमान थे।
अगस्त दो हजार आठ था, घर से निकला था दूर,
क्या पता था तुलुनाडु देगा, यादों का इतना नूर।
भोर के लगभग पाँच बजे, मुल्की की धरती आई,
बैंगलोर वाली एसी बस ने मंज़िल मुझे दिखाई।
हल्की बारिश, ठंडी हवा, नारियल की छाँव,
पहली नज़र में मन को भा गया वह अनजाना गाँव।
वहीं पास रेस्टोरेंट था, एक किस्सा मशहूर था,
सुनील शेट्टी के पुश्तैनी घर का जिक्र जरूर था।
आगे बढ़कर दाहिना मोड़, फिर संकरी-सी राह,
नागार्जुन पावर प्लांट था, मेरी नई पनाह।
Lanco का वह दौर था, मशीनों का संसार,
ऊँची क्रेनें, भारी वाहन, सपनों का विस्तार।
दास साहब का रौब था, पर दिल में अपनापन,
कैंटीन का ‘सर्वहारा भोजन’, याद आता हर क्षण।
केरल वाला ड्राइवर अपना, राहों का ज्ञानी था,
गाँव, संस्कृति और परंपरा की जीवित कहानी था।
नाग कट्टे, नारियल वन, आस्था का संसार,
बीस बरस के मन ने देखा तुलुनाडु पहली बार।
एक साथी घायल हुआ तो छोटे क्लिनिक गए,
वहाँ संस्कृति के कुछ नए अर्थ हमें मिले।
मैंने पूछा—“सबके माथे पर कुमकुम क्यों रहता है?”
जाना—हर प्रदेश में एक प्रतीक अलग कहानी कहता है।
फिर एक शाम हमारी जीप राह में खराब हुई,
मैं और कैशियर चाय पर थे, साँझ जरा खामोश हुई।
तभी सामने भारी ट्रक और नशे में एक इंसान,
मथुरा वाले हाइड्रा साथी ने रुकवाया वाहन तत्काल।
लगा कि रास्ता साफ हुआ, आगे जाने का संकेत मिला,
पर अगले ही पल आँखों के आगे दर्दनाक हादसा घटा।
भीड़ बढ़ी तो हम दोनों वहाँ से निकल गए,
पर उस शाम के कुछ दृश्य स्मृतियों में ठहर गए।
कुछ मंज़र समय नहीं धोता,
कुछ रास्ते मन में रह जाते हैं;
इंसान बहुत आगे निकल जाता है,
पर बीते दिन कहाँ लौटकर आते हैं।
फिर आया एक रविवार, दास साहब भी साथ,
केरल वाला ड्राइवर और उडुपी की राह।
अचानक बादल बरस पड़े, झूम उठे वन-उपवन,
जैकेट पहने दास साहब—आज भी याद वह क्षण।
समंदर की नम हवाएँ, बारिश की बौछार,
नारियल के पेड़ों के बीच अपना छोटा संसार।
तब कहाँ मालूम था हमको—ये पल अनमोल हैं,
आज समझ में आता है, वही दिन बेमोल हैं।
कुछ दिनों बाद अचानक कोरबा का बुलावा आया,
सामान बाँधा और जिंदगी ने नया रास्ता दिखाया।
तुलुनाडु पीछे छूटा, मगर दिल से कहाँ गया,
2008 का नागार्जुन मेरी स्मृतियों में रह गया।
आज अठारह वर्ष बाद सोचूँ—सब कहाँ चले गए?
दास साहब, कैशियर, ड्राइवर—किस राह निकल गए?
कंपनियाँ बदलीं, नाम बदले, बदल गया संसार,
पर यादों में अब भी जीवित है वह बीस बरस का कुमार।
वही मुल्की की सुबह है, वही बारिश की फुहार,
वही पुरानी जीप है, वही साथियों का प्यार।
वक्त आगे बढ़ गया, पर दिल आज भी कहता है—
उस जमाने में आनंद बहुत था,
और मेरा नागार्जुन आज भी स्मृतियों में रहता है।
— जय प्रकाश त्रिपाठी